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चिरमिरी में उमड़ा आस्था का सागर: जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने सुनाया सुंदरकांड और राम-भरत मिलाप का भावपूर्ण प्रसंग

राम नाम स्वयं महामंत्र, सुंदरकांड जीवन में साहस और समर्पण का संदेश भरत के त्याग, हनुमान जी की भक्ति और भारतीय संस्कृति पर जगद्गुरु का प्रेरक प्रवचन जय श्रीराम और जय बजरंगबली के उद्घोष से गूंज उठा कथा पंडाल

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एमसीबी,चिरमिरी। एमसीबी जिले के चिरमिरी स्थित गोदरी पारा के लाल बहादुर शास्त्री स्टेडियम में आयोजित विशाल श्रीराम कथा महोत्सव में विश्वविख्यात संत एवं तुलसी पीठाधीश्वर जगद्गुरु श्री रामभद्राचार्य जी महाराज के श्रीमुख से प्रवाहित श्रीराम कथा का श्रद्धालु भावविभोर होकर रसपान कर रहे हैं। कथा के दौरान सुंदरकांड, राम-भरत मिलाप, चरण पादुका तथा भक्ति के विविध प्रसंगों का अत्यंत भावपूर्ण, ज्ञानवर्धक और आध्यात्मिक वर्णन किया गया। कथा स्थल पर “जय श्रीराम” और “जय बजरंगबली” के जयघोष से संपूर्ण वातावरण भक्तिमय और राममय हो उठा।

जगत्गुरु श्री रामभद्राचार्य जी महाराज ने कथा के दौरान कहा कि न्याय शास्त्र में भगवान को “द्रव्य” माना गया है। द्रव्य वह तत्व है जिसमें गुण निरंतर विद्यमान रहते हैं। उन्होंने कहा कि भगवान को आठवां द्रव्य कहा गया है और भगवान चाहे भी तो गुण उन्हें नहीं छोड़ सकते, क्योंकि भगवान और उनके दिव्य गुणों का संबंध सनातन है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भगवान निर्गुण नहीं हैं, बल्कि निर्गुण का वास्तविक अर्थ यह है कि भगवान सत्व, रज और तम जैसे माया के गुणों से परे हैं। सभी श्रेष्ठ गुणों का मूल स्रोत स्वयं भगवान ही हैं।

 

उन्होंने गीता के अध्याय 14 के श्लोक 26 का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान माया और इंद्रियों से भी परे हैं तथा केवल भक्ति के माध्यम से ही उनकी अनुभूति संभव है। अयोध्याकांड के प्रारंभ से लेकर 140वें दोहे तक के चौथे विश्राम में भगवान के गुणों का अद्भुत वर्णन निहित है।

कथा के दौरान जगद्गुरु ने कहा कि छत्तीसगढ़ भगवान श्रीराम का ननिहाल है, क्योंकि माता कौशल्या का जन्म इसी पावन भूमि पर हुआ था। उन्होंने कहा कि भगवान राम का नाम स्वयं में महामंत्र है और “सीताराम” मंत्रों का राजा है। प्रभु श्रीराम के नाम का स्मरण मात्र जीवन के समस्त कष्टों को दूर करने वाला है। उन्होंने श्रद्धालुओं से नियमित रामनाम जप करने का आह्वान करते हुए कहा कि कलियुग में प्रभु श्रीराम का नाम ही मानव जीवन के उद्धार का सबसे सरल और प्रभावी साधन है।

 

सुंदरकांड की महिमा का वर्णन करते हुए जगद्गुरु ने कहा कि यह केवल धार्मिक ग्रंथ का एक अध्याय नहीं, बल्कि साहस, सेवा, आत्मविश्वास, समर्पण और अटूट श्रद्धा का जीवंत संदेश है। सुंदरकांड मनुष्य को सिखाता है कि यदि उसके भीतर भगवान के प्रति अटूट विश्वास और अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठा हो तो कोई भी बाधा उसे उसके लक्ष्य तक पहुंचने से नहीं रोक सकती। उन्होंने कहा कि पवनपुत्र हनुमान का जीवन भक्ति, शक्ति और विनम्रता का अद्भुत संगम है। हनुमान जी ने अपने अतुलनीय पराक्रम का कभी अहंकार नहीं किया, बल्कि प्रत्येक कार्य को प्रभु श्रीराम की कृपा मानकर संपन्न किया।

राम-भरत मिलाप प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन करते हुए जगद्गुरु ने कहा कि वर्तमान समय में जहां भाई-भाई संपत्ति और धन के लिए विवाद करते दिखाई देते हैं, वहीं भगवान श्रीराम ने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए सहज भाव से वनवास स्वीकार कर संपूर्ण राज्य अपने छोटे भाई भरत के लिए छोड़ दिया। यह त्याग, मर्यादा और भ्रातृ प्रेम का ऐसा अनुपम उदाहरण है जिसकी तुलना विश्व इतिहास में कहीं नहीं मिलती। उन्होंने कहा कि बड़े भाई के रूप में श्रीराम ने अपने सभी दायित्वों का आदर्श रूप से निर्वहन कर समाज को परिवारिक एकता और संस्कारों का संदेश दिया।

 

उन्होंने भरत के त्याग और समर्पण का उल्लेख करते हुए कहा कि भरत श्रीराम को केवल अपने बड़े भाई के रूप में नहीं, बल्कि स्वयं परमात्मा के रूप में पूजते थे। जब उन्हें अयोध्या का राज्य सौंपा गया तो उन्होंने स्वयं सिंहासन स्वीकार करने के बजाय भगवान राम की चरण पादुकाओं का राज्याभिषेक किया और सेवक भाव से राज्य संचालन किया। भरत का यह त्याग भारतीय संस्कृति में भक्ति, विनम्रता और आदर्श शासन व्यवस्था का सर्वोच्च उदाहरण है।

 

कथा के दौरान जगद्गुरु ने इतिहास के एक प्रेरक प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि महाराणा प्रताप और मुगल सम्राट अकबर के संघर्ष के समय महाराणा प्रताप के भाई शक्ति सिंह विरोधी पक्ष में थे। युद्ध के दौरान जब महाराणा प्रताप ने उन्हें राष्ट्रहित और कर्तव्य का स्मरण कराया, तब शक्ति सिंह को राम और भरत के त्याग एवं प्रेम की भावना याद आई। उन्होंने तत्काल अपने भाई से क्षमा मांगकर राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए उनका साथ दिया। जगद्गुरु ने कहा कि भारतीय संस्कृति और रामायण हमें भाईचारे, त्याग और राष्ट्रधर्म की प्रेरणा देती है।

 

उन्होंने समाज में बढ़ती भाषाई हीन भावना पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि हिंदी और संस्कृत हमारी सांस्कृतिक पहचान हैं। यदि विदेशी नागरिक हिंदी सीख और बोल सकते हैं तो भारतीयों को भी संस्कृत और अपनी मातृभाषाओं के प्रति सम्मान रखना चाहिए। उन्होंने युवाओं से भारतीय संस्कृति, परंपरा और भाषा के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।

कथा के दौरान पंचम भक्ति और मंत्रों की महिमा का भी विस्तृत वर्णन किया गया। जगद्गुरु ने कहा कि जीवन में किसी भी प्रकार की विपत्ति आने पर निराश होने के बजाय भगवान श्रीराम और हनुमान जी का स्मरण करना चाहिए। सच्ची भक्ति, पूर्ण शरणागति और प्रभु पर अटूट विश्वास से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।

 

विशाल श्रीराम कथा महोत्सव में प्रतिदिन प्रदेशभर से अनेक विशिष्ट अतिथि भी पहुंच रहे हैं और कथा का रसपान कर रहे हैं। कथा में प्रदेश सरकार के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन प्रशासनिक अधिकारी, भाजपा के वरिष्ठ नेता, भाजपा संगठन के पदाधिकारी, जनप्रतिनिधि तथा स्थानीय संत-महात्मा बड़ी संख्या में उपस्थित होकर जगद्गुरु श्री रामभद्राचार्य जी महाराज का आशीर्वाद प्राप्त कर रहे हैं। कथा आयोजन अब धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक समरसता का भी केंद्र बन गया है।

 

कथा स्थल पर हजारों की संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। आयोजन समिति द्वारा श्रद्धालुओं के बैठने, पेयजल, प्रसाद और अन्य व्यवस्थाओं की समुचित व्यवस्था की गई थी। कथा के प्रत्येक प्रसंग पर श्रद्धालु भावविभोर होकर जय श्रीराम के उद्घोष करते रहे और पूरा वातावरण भक्ति रस में डूबा दिखाई दिया।

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