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सेहत के मोर्चे पर छत्तीसगढ़ की बड़ी छलांग, संस्थागत प्रसव में राष्ट्रीय औसत को पछाड़ा

NFHS-6 की रिपोर्ट में हुआ बड़ा खुलासा: जच्चा-बच्चा सुरक्षा में देश से आगे निकला राज्य; एनीमिया, स्टंटिंग और सिजेरियन डिलीवरी अब भी बड़ी चुनौती

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एमसीबी, 03 जून 2026।छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य और पोषण के मोर्चे पर एक बड़ी और सुखद तस्वीर सामने आई है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-6) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य ने स्वास्थ्य, पोषण और मातृ-शिशु कल्याण के कई महत्वपूर्ण पैमानों पर शानदार कामयाबी हासिल की है। सबसे बड़ी उपलब्धि संस्थागत प्रसव (अस्पतालों में डिलीवरी) के क्षेत्र में मिली है, जहां छत्तीसगढ़ ने राष्ट्रीय औसत को भी पीछे छोड़ दिया है। हालांकि, बस्तर और आदिवासी अंचलों में एनीमिया (खून की कमी) और बच्चों में स्टंटिंग जैसी पुरानी चुनौतियां अब भी सरकार के सामने एक कठिन परीक्षा की तरह खड़ी हैं।

 

बदल रहा है छत्तीसगढ़

कभी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिहाज से पिछड़े माने जाने वाले छत्तीसगढ़ के दावों पर अब देश की सबसे प्रामाणिक स्वास्थ्य रिपोर्ट (NFHS-6) ने मुहर लगा दी है। राज्य में अब 90.6 प्रतिशत प्रसव अस्पतालों में हो रहे हैं, जो देश के औसत (88.6%) से कहीं ज्यादा है। टीकाकरण से लेकर गर्भवती महिलाओं की देखभाल तक, हर आंकड़े में सुधार दर्ज किया गया है। लेकिन इस चमक के पीछे एक स्याह पहलू भी है—निजी अस्पतालों में अनियंत्रित रूप से बढ़ रही सिजेरियन (ऑपरेशन से) डिलीवरी और आदिवासी क्षेत्रों में कुपोषण की मार, जिस पर राज्य सरकार को अब ‘मिशन मोड’ में काम करना होगा।

 

सकारात्मक बदलाव: इन मोर्चों पर छत्तीसगढ़ ने मारी बाजी

अस्पतालों में किलकारियां (संस्थागत प्रसव): NFHS-5 में संस्थागत प्रसव की दर 85% थी, जो अब बढ़कर 90.6% हो चुकी है। इसका सीधा सकारात्मक असर मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में कमी के रूप में दिख रहा है।

शत-प्रतिशत टीकाकरण की ओर बढ़ते कदम: 12 से 23 महीने के बच्चों का पूर्ण टीकाकरण कवरेज बढ़कर 87.1% हो गया है, जो एक बड़ी राहत की खबर है।

गर्भवती महिलाओं को सहारा: गर्भवती महिलाओं को मिलने वाली एंटीनेटल केयर (प्रसव पूर्व जांच और देखभाल) में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।

घट रही है स्टंटिंग: उम्र के हिसाब से कम लंबाई (स्टंटिंग) की दर 35.5% से घटकर अब 29.3% पर आ गई है।

नियंत्रण में आबादी: राज्य में टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) पूरी तरह नियंत्रण में है और गर्भनिरोधकों के उपयोग व महिला स्वास्थ्य बीमा कवरेज के प्रति जागरूकता तेजी से बढ़ी है।

 

चिंता के घेरे में: ये 4 चुनौतियां अब भी दे रही हैं दस्तक

एनीमिया का बढ़ता ग्राफ: 15 से 49 वर्ष की महिलाओं और बच्चों में खून की कमी (एनीमिया) की दर अभी भी बहुत ऊंची बनी हुई है, खासकर ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में यह समस्या जस की तस है।

शहरी बीमारियां और मोटापा: वयस्कों, विशेषकर महिलाओं में ओवरवेट (मोटापे) की समस्या बढ़ रही है। इसके साथ ही हाई ब्लड शुगर और हाइपरटेंशन (ब्लड प्रेशर) के मामलों में भी तेजी देखी गई है।

सिजेरियन डिलीवरी का ‘बाजार’: रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाला खुलासा गैर-जरूरी सिजेरियन डिलीवरी को लेकर हुआ है। राज्य में 27.2% डिलीवरी ऑपरेशन से हो रही है, और यह चलन निजी (प्राइवेट) अस्पतालों में सबसे ज्यादा है।

बस्तर और आदिवासी अंचल: बस्तर जैसे दूरस्थ और संवेदनशील इलाकों में आज भी स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच कम होने के कारण स्टंटिंग और एनीमिया की स्थिति गंभीर बनी हुई है।

NFHS-6 के आंकड़े इस बात का प्रमाण हैं कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय जी के नेतृत्व में हमारी सरकार की स्वास्थ्य नीतियां सही दिशा में आगे बढ़ रही हैं। संस्थागत प्रसव में राष्ट्रीय औसत को पीछे छोड़ना हमारी स्वास्थ्य टीम की कड़ी मेहनत का नतीजा है। रही बात बस्तर और अन्य आदिवासी अंचलों की, तो वहां एनीमिया और स्टंटिंग को खत्म करने के लिए हम आयुष्मान भारत और नेशनल हेल्थ मिशन (NHM) के बजट को सीधे दूरस्थ क्षेत्रों में झोंक रहे हैं। निजी अस्पतालों में अनावश्यक सिजेरियन डिलीवरी की निगरानी के लिए भी सख्त दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे। छत्तीसगढ़ का हर नागरिक स्वस्थ रहे, यही साय सरकार का संकल्प है।

 

श्यामबिहारी जायसवाल, स्वास्थ्य मंत्री, छत्तीसगढ़

 

आगे की राह: दूरस्थ अंचलों पर फोकस जरूरी

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि छत्तीसगढ़ को स्वास्थ्य के मामले में देश का नंबर वन राज्य बनना है, तो मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और स्वास्थ्य मंत्री श्यामबिहारी जायसवाल की जोड़ी को आयुष्मान भारत और नेशनल हेल्थ मिशन की योजनाओं का अधिकतम लाभ बस्तर के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति तक पहुंचाना होगा। जब तक आदिवासी अंचलों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच सहज नहीं होगी, तब तक एनीमिया और कुपोषण पर पूर्ण विजय पाना संभव नहीं होगा।

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